Sunday, November 22, 2009

मेरी परछाई अब चंचल है







खिलखिलाती
धूप में
हँसती हुई परछाईयाँ
इस नदी की धारा में
जिसमें आज गति है
जिसमें आज दिशा है
और मैं दिशाहीन हूँ ।

मैं एक दिशाहीन हूँ
इन दिशाओं में भटककर
इस तट पर बैठ गया हूँ,
कंकर का एक टुकड़ा
मेरी मुट्ठी में कैद है,
जिसके अलावा मेरे पास
कुछ और नहीं शेष है;
कंकर को थामे हुए
इस सुबह की धूप में
इस नदी की धारा में
परछाई देख रहा हूँ ,
जो धारा के साथ-साथ
मंद-मंद हिल रही है,
जिसमें आज गति है
जिसमें आज जान है
और मैं बेजान हूँ ।

मैं एक बेजान हूँ
निर्जीव, निष्प्राण हूँ
इस तट पर बैठा हुआ
चिंतित अपनी परछाई पर,
जो धारा के साथ-साथ
मंद-मंद हिल रही है,
जिसमें आज गति है
जिसमें आज जान है;

किंतु मुझे चिंता है
इसके मंद गति की,
मेरे पास शेष मात्र
केवल एक कंकर ही,
उसी की ओर देखता हूँ
उसे नदी में फेंकता हूँ
और लेकर साँसें गहरी
आश्वस्त होकर सोचता हूँ :
इस धारा में अब हलचल है
मेरी परछाई अब चंचल है
मेरी परछाई अब चंचल है !!


Monday, October 26, 2009

पूछ-ताछ

बुझे हुए दीप,
टूटे हुए गीत,
डूबे हुए चाँद सा,
मेरा ये मन,
पूछताछ कर रहा है;
अपने ही आप से,
कल तक जो जादू था,
सूरज था, भोर था,
मेरे विचार में,
मेरे व्यवहार में,
कल तक जो ज्योति थी,
रौशनी थी, प्रगति थी,
मेरी वाणी में,
मेरी प्रकृति में,
वह आज कहाँ खो गया है?
वह आलोक कहाँ सो गया है?

Monday, October 19, 2009

इस बार की दिवाली


इस
बार की दिवाली
आँसुओंवाली थी ;
इन आंसुओं में गम नहीं था
इन आंसुओं में दर्द नहीं था
इन आंसुओं में यादें थी
बस यादें थी
और यादें थी ।
बचपन की यादें थी
जब दिवाली के त्यौहार पर
मन में उल्लास इस तरह समाता था
कि मन का कोना-कोना जगमगाता था;
मन में पटाखे भी चलते थे
मन में फुलझडी भी चलती थी;
कभी मन चक्री की तरह नाचता था
कभी मन अनार की तरह खिलखिलाता था ;

आज मन में नहीं
बाहर पटाखे चल रहे हैं
बाहर फुलझडी चल रही है;
इसे देखकर मन नाचता नहीं है
खिलखिलाता नहीं है ;
दिवाली के धमाकों में खो गया हूँ,
अब मैं सचमुच बड़ा हो गया हूँ


Sunday, October 04, 2009

मेरी इच्छाएं

इच्छा को खत्म करने की
इच्छा ही एक इच्छा है ;
इस इच्छा का क्या करें
इसे खत्म कैसे करें ।
सोचता रहा मैं
रात भर जागकर
मगर कुछ मिला नहीं
इसके जवाब में,
जो मुझे शांत करता
और मेरे मन को भी
जिसमें आती-जाती है
इच्छाएं बार-बार;

मानो
पूनम की रात है
और मन समुद्र बनकर
ज्वार-भाटा खेल रहा है ;
और इच्छा लहरें बनकर
उठती और गिरती है;
यहीं कहीं लहरों में
फंसा हुआ एक आदमी
अनियंत्रित है,
बेजान है, बेचारा है;
किसी पुतले की तरह
जिसे इच्छा की लहरें
कभी खींचती है तो
कभी धक्के मारती है;

इन्हीं धक्कों को
सहता हुआ वह आदमी
इन लहरों के वश में है;
इससे बचने के लिए
वह कर रहा इंतजार
किसी दूसरी लहर का;
कौन सी लहर
किनारा पहुंचायेगा
उसे नहीं पता है;
इसीलिए वह बेचारा
लहरों से धक्के खाता है,
और ये बतलाता है;
इच्छा को खत्म करने की
इच्छा भी एक इच्छा है ।।


Wednesday, September 30, 2009

डांडिया की रात

कार्यक्रम की जान थी
कार्यक्रम की शान थी
नृत्य में महान थी
किंतु परेशान थी ;
चाहती थी वह
कि कोई टोके उसे
कोई उसका साथ दे
लेकर डांडिया हाथ में;
संगीत चलता रहा
पैर थिरकते रहे
मगर किससे कहे
कि कोई उसका साथ दे
लेकर डांडिया हाथ में ;
इसीलिए परेशान थी ;
कार्यक्रम की जान थी
कार्यक्रम की शान थी

वह डांडिया की रात थी
वह पहली मुलाकात थी,
मुझे कुछ संकोच हुआ
किंतु मैंने सोचा कि
डांडिया के ही बहाने
उनसे मुलाकात कर लूँ ,
उनसे आज बात कर लूँ;
डांडिया लिए हाथ में
पहली मुलाकात में
नृत्य करने लगा
मैं उनके साथ में ;
सगीत चलता गया
पैर थिरकते गये
हो चुका था प्यार मुझे
मगर कैसे कहें,
'कि तुम मेरा साथ दो
मेरे हाथों में हाथ दो। '

वह डांडिया की रात थी
कितनी अजीब बात थी
उस डांडिया के ब्रेक में
उसने नमस्ते कहा,
और मुझसे पूछा कि
कहिये हाल-चाल क्या है?
'अपनापन तो ठीक है
पर ये आप-आप क्या है?'
मैंने उनसे पूछ दिया
'कहिये सच्ची बात क्या है?'
"आप-आप का मतलब मुझसे पूछते हैं
आप तो बहुत बड़े मजाकिए लगते हैं;
आप सचमुच के ही कवि हैं
जैसा कि आपके दोस्त मुझसे कहते हैं ।"

अब हाल तो मेरा बुरा था
भीतर ही भीतर डरा था
लव-ट्रेंगल की फिल्मी-कहानी याद आ गयी थी,
सच कहता हूँ दोस्तों! मेरी नानी याद आ गयी थी ;
तभी मेरा दोस्त भी वहाँ आ गया
और चुटकी लेते हुए मुस्कुरा दिया,
'कैसी है तेरी भाभी ,
मेरी शादी होनेवाली है '
समस्त खुशियों का 'जीरो साइज़' हो गया था
बहुत ही बड़ा ये सरप्राइज़ हो गया था ;
वह डांडिया की रात थी
पर किस्मत नहीं साथ थी
संगीत चलने लगा
पैर थिरकने लगे
मगर किससे कहें
कि कोई मेरा साथ दे
लेकर डांडिया हाथ में ।।