
खिलखिलाती धूप में
हँसती हुई परछाईयाँ
इस नदी की धारा में
जिसमें आज गति है
जिसमें आज दिशा है
और मैं दिशाहीन हूँ ।
मैं एक दिशाहीन हूँ
इन दिशाओं में भटककर
इस तट पर बैठ गया हूँ,
कंकर का एक टुकड़ा
मेरी मुट्ठी में कैद है,
जिसके अलावा मेरे पास
कुछ और नहीं शेष है;
कंकर को थामे हुए
इस सुबह की धूप में
इस नदी की धारा में
परछाई देख रहा हूँ ,
जो धारा के साथ-साथ
मंद-मंद हिल रही है,
जिसमें आज गति है
जिसमें आज जान है
और मैं बेजान हूँ ।
मैं एक बेजान हूँनिर्जीव, निष्प्राण हूँ
इस तट पर बैठा हुआ
चिंतित अपनी परछाई पर,
जो धारा के साथ-साथ
मंद-मंद हिल रही है,
जिसमें आज गति है
जिसमें आज जान है;
किंतु मुझे चिंता है
इसके मंद गति की,
मेरे पास शेष मात्र
केवल एक कंकर ही,
उसी की ओर देखता हूँ
उसे नदी में फेंकता हूँ
और लेकर साँसें गहरी
आश्वस्त होकर सोचता हूँ :
इस धारा में अब हलचल है
मेरी परछाई अब चंचल है
मेरी परछाई अब चंचल है !!






