Monday, May 01, 2006

कुछ तुम कह दो कुछ मैं कह दूँ

हम दूर-दूर हुए तो क्या
दिल को निकट तो आने दो,
मन के कोमल अहसासों को
सात सुरों में गाने दो।

अहसासों के भी कुछ सुन लो
कुछ तुम समझो,कुछ मैं समझूँ।

देखो मांगे क्या मेघ से मोर
चंदा से क्या चाहे चकोर,
किस निज हित हेतु ये पतंगे
लपकते अग्नि-शिखा की ओर।

अरे प्रश्नों में ख़ुद मत उलझो
कुछ तुम सोचो कुछ मैं सोचूं।

लाख-लाख मन प्रश्न पूछकर
उत्तर एक ही पाता है,
दृष्टि की दीवार भेदकर
दिल तक पहुँचा जाता है।

इन पलकों को झुकने मत दो
कुछ तुम देखो कुछ मैं देखूं।

पतझड़ तो पलभर आते हैं
फ़िर मधुवन छाता जाता है,
चातक की व्याकुलता देखकर
मेघ भी पानी बरसाता है।

अब मौसम से ही सीख तो लो
कुछ तुम बदलो कुछ मैं बदलूं।

दिलवालों के दुनिया में भी
दिल ये तनहा-तनहा है,
सदियों से अकेले में ही
कट्टा हर लम्हा-लम्हा है।


अब संकोचों के परदे हटा दो
कुछ तुम कह दो कुछ मैं कह दूँ।

Saturday, April 29, 2006

मृग-तृष्णा

मैं मृग-मानव मरूस्थल का
बूँद-बूँद पानी को तरसा ।

दूर कहीं जल-कुंड कोई था
और पेडों की परछाई थी ,
मन मेरा था मुरझाया सा
मुस्कान तनिक अब आयी थी;

प्रफुल्लित मन, तीव्र गति से
पास मैं उस जल तक आया था,
मृग-तृष्णा वह मेरी थी जो
भूमि को मृग-जल बतलाया था;

जल के बदले स्थल पर ही
उन पेडों की परछाई थी,
मिलते नही जल मरुस्थल में
सिर्फ़ यही एक सच्चाई थी.

सच पर मैं बिना किए भरोसा
तृष्णा को था समझा सच्चा,
मैं मृग-मानव मरूस्थल का
बूँद-बूँद पानी को तरसा ।।

कर्ण के संवाद

these are my fav six lines from rashmirathi...
it is the dialoge of karn to shalya...

यह देह टूटने वाली है
इस मिटटी का कबतक प्रमाण,
मृत्तिका छोड़ उपर नभ में
भी तो ले जाना है विमान.

कुछ जुटा रहा सामान
कमंडल में सोपान बनाने को,
ये चार फुल फेंके मैंने
उपर की राह सजाने को.

ये चार फुल हैं मोल किन्ही
कातर नयनो की पानी के,
ये चार फुल प्रछन्न दान
है किसी महाबल दानी के.

ये चार फुल मेरा अदृष्ट
था हुआ कभी जिनका कामी,
ये चार फुल पाकर प्रसन्न
हँसते होंगे अन्तेर्यामी.

समझोगे नही शल्य इसको
यह करतब नादानों का है,
ये खेल जीत के बड़े किसी
मकसद के दीवानों का है.


जानते स्वाद इसका वे ही
जो सुरा स्वप्न की पीते हैं,
दुनिया में रहकर भी दुनिया से
अलग खड़े जो जीते हैं....:)))

Friday, April 28, 2006

वक्त का रथ

क्त का रथ अनवरत
पथ पर मगर चलता रहा।

सोचा था मैं वक्त बहुत ये
एक पर्वत को पिघला दूँगा,
बनकर भगीरथ इसी धरा पर
एक गंगा कोई बहा दूंगा।

वक्त की परवाह नही की
अपनी धुन में बेखबर था,
चाल वक्त की चपल हैं कितनी
मुझे नहीं मालूम मगर था.

चलते-चलते ठोकर खाया
देखा मैंने पीछे मुड़कर,
वक्त समीप तब मैंने पाया
पीछा करता जो छुप-छुपकर.

हुई वक्त से होड़ हमारी
वक्त को मैंने ललकारा,
ताकत झोंक दी अपनी पूरी
वक्त से फिर भी मैं हारा.

वक्त के आगे विवस हो
हाथ मैं मलता रहा,
वक्त का रथ अनवरत
पथ पर मगर चलता रहा...

Saturday, March 04, 2006

चकोर की अभिलाषा

देखा चाँद उन्मुक्त गगन में
घूम रही तारों के संग,
मुझसे बेखबर वो मगन में
झूम रही बादल के संग;

पर चाँद से मैंने कहा कब
तारों संग रहती क्यों तुम,
पागल जब ये बादल तब
उन्माद उनमें भरती क्यों तुम;

देख-देख ये दुनिया बोली
चाँद पर भी दाग ये,
पर मैंने ये कब पूछा
क्यों तुझपर है दाग ये??

अरे मैं चकोर ये जानता की
चाँद पा सकता नही हूँ,
पराक्रम नही इन परों में
उड़ पास जा सकता नही हूँ;

मैं चकोर बस चाहता हूँ
चाँद को दीदार करूँ ,
चाँद तुम जैसी भी हो अब
बस तुझे ही प्यार करूँ....
बस तुझे ही प्यार करूँ।