Wednesday, August 02, 2006

कर्म

भगवन साफ-साफ बतलाएं
क्यों मैं ऐसा युद्ध करूँ,
इस युद्ध से मुझे क्या मिलेगा
क्यों कर में गांडीव धरुं;

सुनकर हँसे श्रीकृष्ण
और बोले अर्जुन से,
हँसी आती है मुझे
तेरे वचन ये सुन के;

कर्म-भूमि समझो इसको
कर्म करने आए हो,
जगत-कल्याण हेतु तुम
धर्म करने आए हो;

कौन अपना, कौन पराया
कैसा मोह ये कैसी माया,
इस जगत को क्या दिए तुम
और क्या तुमने है पाया ?

कर्म करते रहो जगत में
मत सोचो क्या हो रहा है,
कर्म को तुम छोड़ क्यों अब
फल के लिए रो रहा है;

अर्जुन जब तुम कर्म करोगे
तन-मन ह्रदय लगाकर,
फल निश्चित ही पावोगे
ये धरती या वो अम्बर;

अम्बर जब तुम पाते हो
वीर जगत में कहलाते हो,
धरती जब तुम पाते हो
मार्ग मुक्ति का पाते हो।

Wednesday, July 26, 2006

अर्जुन मुझको बनना होगा

केशव बनकर तुम अब आओ
अर्जुन मुझको बनना है,
गीता मर्म मुझे समझाओ
कुरुभूमि में लड़ना है;

गीता-ग्यान को पाकर अब
धनुष हाथ को धरना होगा,
अर्जुन मुझको बनना होगा।

इर्द-गिर्द हैं चक्रव्यूह
धर्मराज का मन व्याकुल,
जयद्रथ के तलवारों से
अभिमन्यु मरने को आतुर;

हे स्यंदन के सारथि अब
उसी जगह को चलना होगा,
अर्जुन मुझको बनना होगा ।

दुह्शासन के हाथों ने
पांचाली का केश उजाडा,
दानवीर भी द्रुपद-सुता को
वेश्या कहकर आज पुकारा;

लाज बचालो द्रुपद-सुता की
मुझको अभी संवरना होगा;
अर्जुन मुझको बनना होगा ।

कर्ण यहाँ कितने भी हों
धरती मेरी मदद करेगी,
भीष्म-ड्रोन जितने भी हों
अर्थी उनकी यहीं सजेगी;

दुर्योधन का दमन मिटाने
तात-गुरु से लड़ना होगा;
अर्जुन मुझको बनना होगा...
अर्जुन मुझको बनना होगा.

और अंत में..........

मादक मौसम आने भी दो,
उन्मादों को छाने भी दो,
कोई स्वर्गिक सुकुमारी
उर्वसी अब आने भी दो;

भोगी नही मैं एक तपस्वी
खुलकर आज ये कहना होगा,

अर्जुन मुझको बनना होगा ॥

Tuesday, July 04, 2006

दुविधा की लहरें

सामने ये सात पहरे
सात कुंडी,सात ताले,
राह दुर्गम,खाई गहरे
बीहड़ जंगल नदी-नाले;

ताले तो मैं तोड़ दूँ पर
क्या करूँ इन पहरों का,
नाले पीछे छोड़ दूँ पर
क्या करूँ इन लहरों का;

लहर है मन में,
लहर है तन में,
पल-पल प्रति-क्षण
लहरें जीवन में;

इन लहरों से टकराकर
कश्ती टूटे साहिल छूटा,
इन शहरों में तो आकर
रिश्ते टूटे नाता रूठा;

रिश्तों की बुनियाद पर अब
टूट जाना चाहता हूँ,
ऐ जिगर के टुकड़े तुझसे
रूठ जाना चाहता हूँ;

लगन है मन में,
अगन है तन में,
कण-कण क्षण-क्षण
मगन चिंतन में;

तोड़ दूंगा पहरों को भी,
मोड़ दूंगा लहरों को भी,
रिश्तों की बुनियाद पर मैं
छोड़ दूंगा शहरों को भी.

Sunday, May 28, 2006

गाँव की तस्वीर

खेतों में, खलिहानों में,
पीपल पेड़ों की छावों में,
रहीमा-रमुआ की नावों में
घूम रहा मैं गावों में;

जहा अभी चुनावी हलचल
बादल बनकर गहराया है,
जनता में जनमत की लहर
सागर के सम लहराया है;

आरक्षण की अद्भुत महिमा
अपना भी रंग जमाया है,
पंचायत की आधी सत्ता
सबला के हाथ थमाया है;

वो सबला जिनके चेहरे पर
अबतक थी लज्जा की लाली,
निकल पड़ी घर के बाहर
कहकर जय अम्बा जय काली;

फ़िर भी दिखता है कुछ-कुछ
जंजीरें इन पावों में,
उम्मीद प्रबल पर बदलेगी
तस्वीरें इन गावों में.

शर्त....the bet

चलो तुम शर्त लगाओ...
कहना है आसान मगर
करना मुश्किल है,
जरा करके दिखलाओ,
चलो तुम शर्त लगाओ;

सुनकर मैंने सोचा कुछ-कुछ
तब मैंने बोला ये सचमुच...

धैर्य नही अब और धारूंगा
बातों से ही नही लडूंगा,
तुम्हे करके दिखलाते हैं
चलो हम शर्त लगाते हैं;

सुनकर उत्तेजित मन उसका
बोला- mr. one minute just,
how can u talk with a girl
try to learn english first;

don't take it very easy
don't think u r great,
think a while,
take a breath,
this isn't a simple bet.

मेरा ज़मीर अंदर से डोला
मुंह ये खोला,फ़िर से बोला...
तुम्हें करके दिखलाते हैं
चलो हम शर्त लगाते हैं.