Wednesday, August 09, 2006

सोच और शक्ति

आज अगर मैं झुकता हूँ
सदा-सदा को झुकना होगा,
आज अगर मैं रुकता हूँ
यही मुझे फ़िर रुकना होगा;

मैं तो सिर्फ़ सोच हूँ
वो तो कोई शक्ति है,
मैं श्रधा कोई तेरा
वो तो तेरी भक्ति है;

आज सोच क्या लड़ पायेगा
शक्ति से टकरा जायेगा,
वो टूट-टूट बिखरेगा या
समर-विजेता बन जायेगा;

भविष्य तुझे बतलायेगा
वर्तमान अभी चल रहा है,
सोच को आगे देख बढ़ते
शक्ति आज कोई जल रहा है;

अब तो दोनों टकरायेंगे
अपने-अपने सुर गायेंगे,
हम तो बस दर्शक ठहरे
चुप-चाप देखते जायेंगे.

Sunday, August 06, 2006

मल्हार 06

अटल बिहारी के वैवाहिक विज्ञापन की कुछ झलकियाँ प्रस्तुत हैं....

मत समझो मेरी उम्र गई
अब भी मुझमें यौवन संचय,
हिंदू तन-मन,हिंदू जीवन
रग-रग हिंदू मेरा परिचय;
आजन्म ब्रह्मचारी,न ही कोई कन्या निहारी
अब चाहिए उसे कोई सुकोमल सुकुमारी,
सुशील,सुंदर और शुद्ध शाकाहारी.
(ह्म्म्म्म्म...बीच की बातें नही लिखूंगा...गंदे-गंदे थे..शर्म आ रही है)
अंत में...
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ,
गीत नया गाता हूँ-२
शादी करने को आता हूँ-२

Saturday, August 05, 2006

शर-संधान

अर्जुन अब क्या सोच रहे हो
देखो रवि निकल आया है,
वचन-पूर्ण कर लो अपना
ये सब तो मेरी माया है;

केशव का ये देख इशारा
शर-संधान किया अर्जुन ने,
पल-भर में ही जयद्रथ को
मार गिराया भीषण रन में;

आज भी केशव जगत में
अर्जुन निज को तुम पहचानो,
वक्त की करवट को देखो
अपने निज लक्ष्य को जानो;

देख उनका भी इशारा
लक्ष्य को तुम छोड़ दोगे,
वक्त से होकर विवस तुम
कर्म से मुंह मोड़ लोगे;

फ़िर आगे तब कौन लडेगा
अभिमन्यु अभी और मरेंगे,
तेरा अंत नही है सबकुछ
युद्ध यहाँ तो चलते रहेंगे;

अपने मन में सु-विचार भर
निज-विद्या का ध्यान करो,
आज भी किसी कुरुक्षेत्र में
जयद्रथ पर शर-संधान करो।

Thursday, August 03, 2006

बदलते मौसम

मौसम कुछ-कुछ बदल रहा है..

गर्मी तो अब बीत चली है
ताप रवि का लरज रहा है,
लो साथी ये सावन आया
बादल आ-आ गरज रहा है;
मौसम......

शीत का प्रकोप भी अब
धीरे-धीरे टल रहा है,
बागों में कूके ये कोयल
फूल कोई फल रहा है;
मौसम......

इन बदले-बदले मौसम में
जीवन सारा बदल रहा है,
वो देखो अब सूरज ये भी
धीरे-धीरे ढल रहा है;
मौसम......

Wednesday, August 02, 2006

कर्म

भगवन साफ-साफ बतलाएं
क्यों मैं ऐसा युद्ध करूँ,
इस युद्ध से मुझे क्या मिलेगा
क्यों कर में गांडीव धरुं;

सुनकर हँसे श्रीकृष्ण
और बोले अर्जुन से,
हँसी आती है मुझे
तेरे वचन ये सुन के;

कर्म-भूमि समझो इसको
कर्म करने आए हो,
जगत-कल्याण हेतु तुम
धर्म करने आए हो;

कौन अपना, कौन पराया
कैसा मोह ये कैसी माया,
इस जगत को क्या दिए तुम
और क्या तुमने है पाया ?

कर्म करते रहो जगत में
मत सोचो क्या हो रहा है,
कर्म को तुम छोड़ क्यों अब
फल के लिए रो रहा है;

अर्जुन जब तुम कर्म करोगे
तन-मन ह्रदय लगाकर,
फल निश्चित ही पावोगे
ये धरती या वो अम्बर;

अम्बर जब तुम पाते हो
वीर जगत में कहलाते हो,
धरती जब तुम पाते हो
मार्ग मुक्ति का पाते हो।