अकेलापन
किसी निर्जन वन
में अकेले रहने से नहीं आता है,
वो आता है
जब आसपास के लोगों की
भाषा समझ में नहीं आती,
उनके रचे हुए जीवन की
परिभाषा समझ में नहीं आती;
आज मैं अकेला हूँ
आसपास हैं लोग अनेक
सबके चेहरे देखते हुए
भी पहचान नहीं पाता हूँ,
बिना कोई आवाज़ दिए
अपने बढे कदम वापस लाता हूँ,
डर रहता है आवाज़ खोने का
डर रहता है गुमनाम होने का
दुनिया की भीड़ में
उलझे हुए चीड में
सवाल भी उलझ रहे हैं
अकेलापन ये है क्या?
Monday, January 08, 2007
Friday, December 29, 2006
बूँद और मोती
बारिश की कुछ बूँदें
जब धरती पर आई थी,
तीन तरह से धरती पर
स्वागत उसने पायी थी,
पहली बूँद चली इठलाती
अपनी किस्मत पर बलखाती
गिरी लौह की तप्त धार पर
राख बनी अस्तित्व मिटाती,
दूजी बूँद जरा संभलकर
गिरी पुष्प की पंखुरियों पर,
दिखने में मोती सी लगी
अगले पल मिटटी में मिली...
भाग्य प्रबल था तीजी का
एक सीप उसके लिए खुला था,
सत्य-प्रेम के सीप के अंदर
मोटी बन गई आगे चलकर।
जब धरती पर आई थी,
तीन तरह से धरती पर
स्वागत उसने पायी थी,
पहली बूँद चली इठलाती
अपनी किस्मत पर बलखाती
गिरी लौह की तप्त धार पर
राख बनी अस्तित्व मिटाती,
दूजी बूँद जरा संभलकर
गिरी पुष्प की पंखुरियों पर,
दिखने में मोती सी लगी
अगले पल मिटटी में मिली...
भाग्य प्रबल था तीजी का
एक सीप उसके लिए खुला था,
सत्य-प्रेम के सीप के अंदर
मोटी बन गई आगे चलकर।
तुम और चिंतन
मन में उभर रही हो
तन पे संवर रही हो
पता नहीं क्यूँ तुम ही
चिंतन में ठहर रही हो,
अब तन सुलग रहा है
अब मन सुलग रहा है
साथ तेरा पाकर मेरा
जीवन सुलग रहा है,
किस वक्त का इंतजार है
किस बात की तकरार है
जो दिल है तेरा कह रहा
क्यूँ तुझे इनकार है...
ह्म्म्म्म्म...
तन पे संवर रही हो
पता नहीं क्यूँ तुम ही
चिंतन में ठहर रही हो,
अब तन सुलग रहा है
अब मन सुलग रहा है
साथ तेरा पाकर मेरा
जीवन सुलग रहा है,
किस वक्त का इंतजार है
किस बात की तकरार है
जो दिल है तेरा कह रहा
क्यूँ तुझे इनकार है...
ह्म्म्म्म्म...
Saturday, December 23, 2006
कुछ लिख रहा हूँ
ये अँधेरी रात है पर
अनगिनत है दिये यहाँ
इन दीयों की दीप्ती में
जगमगाता दिख रहा हूँ,
आज मैं कुछ लिख रहा हूँ;
जगमगा लो द्वार-घर तुम
और जगत संसार अब तुम
एक लपट दिखाने इस जग को
जलता हुआ मिट रहा हूँ,
आज मैं कुछ लिख रहा हूँ;
अनगिनत इस पथ गए पर
वो निशानें अब कहाँ
उन निशानों को ढूंढता
पत्थरों से पिट रहा हूँ,
आज मैं कुछ लिख रहा हूँ.
अनगिनत है दिये यहाँ
इन दीयों की दीप्ती में
जगमगाता दिख रहा हूँ,
आज मैं कुछ लिख रहा हूँ;
जगमगा लो द्वार-घर तुम
और जगत संसार अब तुम
एक लपट दिखाने इस जग को
जलता हुआ मिट रहा हूँ,
आज मैं कुछ लिख रहा हूँ;
अनगिनत इस पथ गए पर
वो निशानें अब कहाँ
उन निशानों को ढूंढता
पत्थरों से पिट रहा हूँ,
आज मैं कुछ लिख रहा हूँ.
Thursday, December 21, 2006
मैं भूल चुका हूँ
बीती बातें मत
याद दिलाना
मैं भूल चुका हूँ,
जख्मो पर मत
नमक लगाना
मैं भूल चुका हूँ,
कितने फांसी के
तख्तों पर
मैं झूल चुका हूँ,
पर गलती मत
याद दिलाना
मैं भूल चुका हूँ।
याद दिलाना
मैं भूल चुका हूँ,
जख्मो पर मत
नमक लगाना
मैं भूल चुका हूँ,
कितने फांसी के
तख्तों पर
मैं झूल चुका हूँ,
पर गलती मत
याद दिलाना
मैं भूल चुका हूँ।
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