
ये व्यक्तित्व
बतलाता है आपके विचार
बतलाता है आपके व्यवहार,
और लाता है आपमें
एक अद्भुत निखार;
ये पारदर्शी होता है
दूर से ही झलक जाता है
नजरों में छलक जाता है
जब भी एक दरश पाता है.
तो क्या वो
शीशे की तरह तुनक होता है
जो गिरते ही अपना अस्तित्व खोता है,
ये तुनक नहीं
गीली मिटटी की तरह
मुलायम होता है
जो गिरकर अस्तिस्त्व नाहीं
अपना आकार खोता है,
गीली मिटटी जो आकार चाहे पा सकता है
उसे कैसा भी बनाया जा सकता है,
निर्भर करता है कुम्भकार पर
वो कितना ध्यान देता है
किसको कैसा रूप देता है,
सचमुच ही व्यक्तित्व
खत्म नहीं होता
बस स्वरुप बदलता है,
पर जो चोट खाकर भी
अपना आकार नहीं खोता है
वो कोई परिपक्व होता है
ये परिपक्वता आती है
जब माटी आग में तपता है
व्यक्तित्व ठोकरें सहता है...
आज फ़िर कोई मिटटी पककर तैयार है
फ़िर से हर्षित कोई कुम्भकार है॥
-Poet fantasy about his personality-

