Thursday, September 03, 2009

क्यों लक्ष्य बदल जाता है ?










जीवन
-पथ पर चलते-चलते
क्यों अक्सर ये हो जाता है ?
कभी राह बदल जाता है ,
कभी लक्ष्य बदल जाता है

मैंने देखा एक खिलाड़ी
खेल के उस मैदान पर,
गोल-पोस्ट के समीप जो
खड़ा था सीना तानकर ;

खेल बड़ा ही घमासान था
गोल-पोस्ट था सबका निशाना,
पर उसने अपने प्रयास से
रोका गेंद का आना-जाना;

उस खेल का नियम गजब था,
वही गोल-पोस्ट, वही जगह था;
बदल गया पर वही खिलाड़ी
जो खड़ा वहाँ अबतक था

मैंने देखा वही खिलाड़ी
खेल के उसी मैदान पर,
गेंद को लेकर भाग रहा था
गोल-पोस्ट को लक्ष्य मानकर;

जीवन भी एक खेल ही है
और अक्सर ये हो जाता है,
कभी राह बदल जाता है ,
कभी लक्ष्य बदल जाता है

Monday, August 31, 2009

अतीत में झांकता हूँ


प्रभात
की डेहरी पर बैठा
रात्रि की ओर ताकता हूँ

एक लगाव जो मुझे हुआ था
उस अजब-अनोखी रात से,
जिस रात का कितना पहर था
मुझे आज भी मालूम नहीं है ;

आज भी मुझे याद नही
वह रात थी कितनी अँधेरी,
कितना विषम
कितना त्रासद
कोई पाप था या शाप था
पर मन मेरा है काँपता
सोचकर उस रात को
जिसमें छुपा मेरा दर्द है
और सिमटा शब्द है

प्रभात की डेहरी पर बैठा
रात्रि की ओर ताकता हूँ

ताकत नहीं मुझमें बचा
चलूँ दिवस की ओर जरा,
चाहत नहीं मुझमें बचा
लूटूं किरणों का भी मजा ;

चाह मेरी लुट गई
उम्मीद मगर शेष है
कि दिवा की किरणें कभी
मुझको ललचाएगी
मुझको बहकाएगी
कभी हौसला बढाएगी
नए पाठ पढ़ाएगी
पर फिलहाल इससे बेखबर
अतीत में झांकता हूँ ,
प्रभात की डेहरी पर बैठा
रात्रि की ओर ताकता हूँ ।।

Friday, April 10, 2009

प्रेरणा खो दिया हूँ

प्रेरणा बनके मैं दुनिया की
प्रेरणा अपनी मैं खो दिया हूँ।

राहों में सबके ये दीपक जलाए
मन का अँधेरा मिटा नहीं पाया,
और उन अंधेरों में राहों को ढूंढता
ठोकर हमेशा मैं खाके जिया हूँ ;
प्रेरणा बनके मैं दुनिया की
प्रेरणा अपनी मैं खो दिया हूँ।


सागर में मथनी चलाने वालों
अब मेरे पास वापस न आना,
सागर से अमृत निकले, न निकले
विष जो भी निकला मैं ही पिया हूँ;
प्रेरणा बनके मैं दुनिया की
प्रेरणा अपनी मैं खो दिया हूँ

Friday, April 03, 2009

कोई मुझे आवाज़ न दो

आज पुरानी राहों से
कोई मुझे आवाज़ न दो;

उन आंखों में कोई सपना था
उन सपनों में था नाम तेरा,
तेरे नाम का मैं दीवाना था
तू शमां थी मैं परवाना था ;
अब तन्हा मुझको रहने दो
तन्हाई ये आबाद न हो ,
आज पुरानी राहों से
कोई मुझे आवाज़ न दो ।

Tuesday, February 24, 2009

सच या सपना





सच में रहूँ या सपनों में
ये बात समझ नही पाता हूँ ;

सच भी मुझे बुलाता है
सपने भी मुझे बुलाते हैं,
सच भी मुझे रुलाता है
सपने भी मुझे रुलाते हैं;
सपनों में उलझ सा जाता हूँ
सच से भी धोखा खाता हूँ,
सच में रहूँ या सपनों में
ये बात समझ नही पाता हूँ ।

ये सपने तो क्षणभंगुर हैं
सच यही मुझे सुनाता है,
ये सच पर नीरस सा है
सपना यही मुझे दिखाता है;
सच की सुनूँ या सपने देखूं
इस द्वंद में मैं रह जाता हूँ,
सच में रहूँ या सपनों में
ये बात समझ नही पाता हूँ ।