Sunday, September 06, 2009

IIT की जिन्दगी

इस बार 'वाणी' में फ्रेशी जनता के लिए जो कविता प्रस्तुतीकरण प्रतियोगिता हुई, उसके निर्णायक चरण में IIT की जिन्दगी पर कविता सुनानी थी. प्रतियोगिता बहुत शानदार रही, मैंने भी एक कविता सुनाई थी, इसे यहाँ लिख रहा हूँ .....

उस हसीना की यादों में पूरी रात जागा था ,
और सुबह होते ही झटपट class भागा था ;
lecture में बैठे-बैठे, मैं सोने लगा था,
अपने आप पर नियंत्रण खोने लगा था ।

मगर प्यारे prof ने,ये होने नहीं दिया
पलभर के लिए भी मुझे सोने नहीं दिया ;
lecture से लौटकर बिस्तर पर सो गया,
उसके हसीं सपनों में फ़िर से खो गया ।

नींद खुली मेरी तो बारह बज रहे थे,
lan-ban होने के लक्षण लग रहे थे;
झटपट में मैंने अपना GPO खोला,
तभी किसी ने PA पर आकर बोला:
" पप्पू का जन्मदिन है, सब बंप्स लगाने आ जाओ,
उसके बाद जितना चाहो, कैंटीन में जाकर खाओ !"

पेट में चूहे कूद रहे थे भूख के कारण
GPO को छोड़ किया रुद्र रूप धारण;
फिर जाकर पप्पू को जमकर लात लगाया,
मस्ती करके कमरे में तीन बजे आया ।

ये IIT की जिन्दगी है,
नींद का नहीं यहाँ ठिकाना;
रोज-रोज ये रात्रि-जागरण,
हे ईश्वर! तू मुझे बचाना(इनका प्रयोग करना था)

जागते-जागते सोच रहा था कल के नुकसान पर ,
बड़ी मुश्किल से आया एक-एक चीज ध्यान पर;
Quiz छूटा, Lab छूटा, एक class छूट गया,
और 'वाणी' का एक 'मुलाकात' छूट गया ।

रोहित नाराज़ होगा, भावना नाराज़ होगी ,
पता नहीं रश्मिजी मुझसे क्या कहेगी ;
फिर मैंने सोचा कि चुप तो नहीं रहूँगा
मुझसे वे पूछेंगे तो झूठ-मूठ कह दूँगा :
Quiz था ,Lab था, एक presentation था,
एक नहीं तीन-तीन Assignment submission था;
ये IIT की जिन्दगी भी जिन्दगी है क्या?
साँस लेने तक की, फ़ुरसत नहीं यहाँ ; [इस दो पंक्ति का प्रयोग कविता में करना था]
थोडी फ़ुरसत मिली, बस यहीं आ रहा हूँ ;
आप सबको अपनी ये कविता सुना रहा हूँ ।।

Thursday, September 03, 2009

क्यों लक्ष्य बदल जाता है ?










जीवन
-पथ पर चलते-चलते
क्यों अक्सर ये हो जाता है ?
कभी राह बदल जाता है ,
कभी लक्ष्य बदल जाता है

मैंने देखा एक खिलाड़ी
खेल के उस मैदान पर,
गोल-पोस्ट के समीप जो
खड़ा था सीना तानकर ;

खेल बड़ा ही घमासान था
गोल-पोस्ट था सबका निशाना,
पर उसने अपने प्रयास से
रोका गेंद का आना-जाना;

उस खेल का नियम गजब था,
वही गोल-पोस्ट, वही जगह था;
बदल गया पर वही खिलाड़ी
जो खड़ा वहाँ अबतक था

मैंने देखा वही खिलाड़ी
खेल के उसी मैदान पर,
गेंद को लेकर भाग रहा था
गोल-पोस्ट को लक्ष्य मानकर;

जीवन भी एक खेल ही है
और अक्सर ये हो जाता है,
कभी राह बदल जाता है ,
कभी लक्ष्य बदल जाता है

Monday, August 31, 2009

अतीत में झांकता हूँ


प्रभात
की डेहरी पर बैठा
रात्रि की ओर ताकता हूँ

एक लगाव जो मुझे हुआ था
उस अजब-अनोखी रात से,
जिस रात का कितना पहर था
मुझे आज भी मालूम नहीं है ;

आज भी मुझे याद नही
वह रात थी कितनी अँधेरी,
कितना विषम
कितना त्रासद
कोई पाप था या शाप था
पर मन मेरा है काँपता
सोचकर उस रात को
जिसमें छुपा मेरा दर्द है
और सिमटा शब्द है

प्रभात की डेहरी पर बैठा
रात्रि की ओर ताकता हूँ

ताकत नहीं मुझमें बचा
चलूँ दिवस की ओर जरा,
चाहत नहीं मुझमें बचा
लूटूं किरणों का भी मजा ;

चाह मेरी लुट गई
उम्मीद मगर शेष है
कि दिवा की किरणें कभी
मुझको ललचाएगी
मुझको बहकाएगी
कभी हौसला बढाएगी
नए पाठ पढ़ाएगी
पर फिलहाल इससे बेखबर
अतीत में झांकता हूँ ,
प्रभात की डेहरी पर बैठा
रात्रि की ओर ताकता हूँ ।।

Friday, April 10, 2009

प्रेरणा खो दिया हूँ

प्रेरणा बनके मैं दुनिया की
प्रेरणा अपनी मैं खो दिया हूँ।

राहों में सबके ये दीपक जलाए
मन का अँधेरा मिटा नहीं पाया,
और उन अंधेरों में राहों को ढूंढता
ठोकर हमेशा मैं खाके जिया हूँ ;
प्रेरणा बनके मैं दुनिया की
प्रेरणा अपनी मैं खो दिया हूँ।


सागर में मथनी चलाने वालों
अब मेरे पास वापस न आना,
सागर से अमृत निकले, न निकले
विष जो भी निकला मैं ही पिया हूँ;
प्रेरणा बनके मैं दुनिया की
प्रेरणा अपनी मैं खो दिया हूँ

Friday, April 03, 2009

कोई मुझे आवाज़ न दो

आज पुरानी राहों से
कोई मुझे आवाज़ न दो;

उन आंखों में कोई सपना था
उन सपनों में था नाम तेरा,
तेरे नाम का मैं दीवाना था
तू शमां थी मैं परवाना था ;
अब तन्हा मुझको रहने दो
तन्हाई ये आबाद न हो ,
आज पुरानी राहों से
कोई मुझे आवाज़ न दो ।