Monday, April 08, 2013

ओ राही !

इस जीवन की डगर कठिन
तू संभल के चलना
ओ राही !

कहीं कदम ये फिसल गया
तो तू ठोकर खा जाएगा,
इन पत्थर से, इन काँटों से
पैर तेरे ये छिल जायेंगे,
तेरे पग से लहू की बूँदें
गिर मिट्टी में मिल जायेंगे।

इन सूनी सुनसान डगर पर
कोई एक लुटेरा आ जाएगा,
जीवन भर का अथक परिश्रम
लूट तेरा वह ले जाएगा,
तू खाली हाथ रह जाएगा
इस पथ पर ही पछतायेगा।

इस जीवन की डगर कठिन
तू संभल के चलना
ओ राही !

Sunday, November 22, 2009

मेरी परछाई अब चंचल है







खिलखिलाती धूप में
हँसती हुई परछाईयाँ
इस नदी की धारा में
जहां आज भी गति है
जहां आज भी दिशा है
और मैं दिशाहीन हूँ ।

मैं एक दिशाहीन हूँ
इन दिशाओं में भटककर
इस तट पर बैठ गया हूँ,
पत्थर का एक टुकड़ा
मेरी मुट्ठी में कैद है,
जिसके अलावा मेरे पास
कुछ और नहीं शेष है;
इस पत्थर को थामे हुए
इस सुबह की धूप में
इस नदी की धारा में
अपनी परछाई देख रहा हूँ ,
जो धारा के साथ-साथ
मंद-मंद हिल रही है,
जहां आज भी गति है
जहां आज भी जान है
और मैं बेजान हूँ ।

मैं एक बेजान हूँ
निर्जीव, निष्प्राण हूँ
इस तट पर बैठा हुआ
चिंतित अपनी परछाई पर,
जो धारा के साथ-साथ
मंद-मंद हिल रही है,
जहां आज भी गति है
जहां आज भी जान है;

फिर भी मुझे चिंता है
इसके मंद गति की,
मेरे पास शेष मात्र
केवल एक पत्थर ही,
इसी की ओर देखता हूँ
इसे भी नदी में फेंकता हूँ
और लेकर साँसें गहरी
आश्वस्त होकर सोचता हूँ :
इस धारा में अब हलचल है
मेरी परछाई अब चंचल है
मेरी परछाई अब चंचल है !!


Monday, October 26, 2009

वैरागी जीवन

इस वैरागी जीवन में
एक राग सुना दो
तुम आकर,
मेरे मन की उलझन के
कोई राज बता दो
तुम आकर;

मेरा मन कटी पतंग सा
भटक गया आसमान में,
इसकी कोई डोर किधर
एक बार बता दो
तुम आकर;

मेरे सपनो की नौकाएँ
भटक गयी सभी दिशाएँ,
इन नौकाओं में  सुन्दर
पतवार लगा दो
तुम आकर;


इस वैरागी जीवन में
एक राग सुना दो
तुम आकर,
मेरे मन की उलझन के
कोई राज बता दो
तुम आकर।

Monday, October 19, 2009

इस बार की दिवाली


इस
बार की दिवाली
आँसुओंवाली थी ;
इन आंसुओं में गम नहीं था
इन आंसुओं में दर्द नहीं था
इन आंसुओं में यादें थी
बस यादें थी
और यादें थी ।
बचपन की यादें थी
जब दिवाली के त्यौहार पर
मन में उल्लास इस तरह समाता था
कि मन का कोना-कोना जगमगाता था;
मन में पटाखे भी चलते थे
मन में फुलझडी भी चलती थी;
कभी मन चक्री की तरह नाचता था
कभी मन अनार की तरह खिलखिलाता था ;

आज मन में नहीं
बाहर पटाखे चल रहे हैं
बाहर फुलझडी चल रही है;
इसे देखकर मन नाचता नहीं है
खिलखिलाता नहीं है ;
दिवाली के धमाकों में खो गया हूँ,
अब मैं सचमुच बड़ा हो गया हूँ


Sunday, October 04, 2009

मेरी इच्छाएं


मेरे मन में आती है
इच्छाएँ बार-बार,
इच्छाओं का क्या करें
इन्हें खत्म कैसे करें ।
सोचता रहा मैं
रात भर जागकर
मगर कुछ मिला नहीं
इसके जवाब में,
जो मुझे शांत करता
और मेरे मन को भी
जिसमें आती-जाती है
इच्छाएँ बार-बार;
मानो पूनम की रात है
और मन समुद्र बनकर
ज्वार-भाटा खेल रहा है ;
और इच्छा लहरें बनकर
उठती और गिरती है;


यहीं कहीं लहरों में
फंसा हुआ एक आदमी
अनियंत्रित है,
बेजान है, बेचारा है;
किसी पुतले की तरह
जिसे इच्छा की लहरें
कभी खींचती है तो
कभी धक्के मारती है;

इन्हीं धक्कों को
सहता हुआ वह आदमी
इन लहरों के वश में है;
इनसे बचने के लिए
वह कर रहा इंतजार
किसी दूसरी लहर का;
कौन सी लहर
किनारा पहुंचायेगा
उसे नहीं पता है;
इसीलिए वह बेचारा
लहरों से धक्के खाता है,
और ये बतलाता है;
इच्छा को खत्म करने की
इच्छा भी एक इच्छा है ।।