शरद पूर्णिमा की रात ये
चाँद अपने यौवन पर है,
ओस गिरे हैं,सुमन खिले हैं
जगमग-जगमग डगर-डगर है,
सरिता की ये शांत लहर है,
साहिल पर बैठा कोई चकोर
चाँद देख मन बहलाता है,
चाँद भी ख़ुद पर इतराता है....
अमावस्या की रात ये
अपने गगन में चाँद कहाँ है
ओस कहाँ हैं,सुमन कहाँ है,
अन्धकार हर डगर-डगर है
सरिता में भी कहाँ लहर है,
साहिल पर बैठा वही चकोर
आंसू लाख ये बरसाता है,
चाँद भी ख़ुद पर शर्माता है ....
दिन बदले, बदला नही मौसम
और नज़रिया बदल रहा है
बदल रहा है,बदल रहा है....
...ek aur nazzariya...a sophie production....
Thursday, August 31, 2006
Tuesday, August 29, 2006
शतरंज
शतरंज हम खेल रहे थे
मनो-यातना झेल रहे थे,
मैं सोच रहा टेढा-टेढा
वह सीधा-सीधा खेल दिया;
बाज़ी फिर मैं हार गया ....
चाल-चाल कुछ कहते थे
मोहरे-मोहरे बोल रहे थे,
हर स्थिति और परिस्थिति
भेद उसी का खोल रहे थे;
पर मैंने बिना सोचे-समझे
घोड़ा चला, वजीर बचाया,
खेल जीत जब वापस आया
राजा को नही जगह पे पाया;
शायद मैं था हार चुका
तब जाकर ये पता चला,
मेरे जीत पर क्यूँ हैरानी
तब जाकर ये पता चला;
शतरंज नही दो मानव का
शतरंज विचारों का केवल,
अब विचार तो टूट गया
शतरंज भी छूट गया।
मनो-यातना झेल रहे थे,
मैं सोच रहा टेढा-टेढा
वह सीधा-सीधा खेल दिया;
बाज़ी फिर मैं हार गया ....
चाल-चाल कुछ कहते थे
मोहरे-मोहरे बोल रहे थे,
हर स्थिति और परिस्थिति
भेद उसी का खोल रहे थे;
पर मैंने बिना सोचे-समझे
घोड़ा चला, वजीर बचाया,
खेल जीत जब वापस आया
राजा को नही जगह पे पाया;
शायद मैं था हार चुका
तब जाकर ये पता चला,
मेरे जीत पर क्यूँ हैरानी
तब जाकर ये पता चला;
शतरंज नही दो मानव का
शतरंज विचारों का केवल,
अब विचार तो टूट गया
शतरंज भी छूट गया।
Sunday, August 20, 2006
उचित अवसर
अतुल शौर्य से सुशोभित
प्रतापी वीर महादानी,
कुरुक्षेत्र की सनसनी वह
पर दम्भी महा-अभिमानी;
जिस कर्ण के भुजबल से ही
समरभूमि ये डोल रहा है,
आज समर की इस बेला में
सामने निहत्था खड़ा है;
केशव! क्या ये धर्म होगा
निहत्थे पर प्रहार करूंगा,
ले अधर्म का मैं सहारा
शत्रु का संहार करूंगा;
अर्जुन! मिटा दो शत्रु को
उचित अवसर यही है,
ये धर्म और अधर्म क्या
सोचना विल्कुल नही है;
सोच कर तुम क्या करोगे
सोचोगे तब क्या लडोगे,
पार्थ कर्म करते रहो
तभी समर-विजयी बनोगे।
प्रतापी वीर महादानी,
कुरुक्षेत्र की सनसनी वह
पर दम्भी महा-अभिमानी;
जिस कर्ण के भुजबल से ही
समरभूमि ये डोल रहा है,
आज समर की इस बेला में
सामने निहत्था खड़ा है;
केशव! क्या ये धर्म होगा
निहत्थे पर प्रहार करूंगा,
ले अधर्म का मैं सहारा
शत्रु का संहार करूंगा;
अर्जुन! मिटा दो शत्रु को
उचित अवसर यही है,
ये धर्म और अधर्म क्या
सोचना विल्कुल नही है;
सोच कर तुम क्या करोगे
सोचोगे तब क्या लडोगे,
पार्थ कर्म करते रहो
तभी समर-विजयी बनोगे।
Saturday, August 19, 2006
सूर्यग्रहण
एक दिन अचानक
चंद्रमा मौका पाता है
शक्ति का जोर दिखाता है,
पल भर में ही कोशिश कर
सूर्य के उपर छा जाता है;
अब सूर्य बेचारा क्या करेगा
किससे अपनी बात कहेगा,
वो चाँद कोई इस नभ का है
रात का राजा कहलाता है,
तारों के बीच संवर करके
दुनिया का मन बहलाता है;
सूर्य के बेदाग़ तेज से
दुनिया सदा जली रहती है,
चाँद पर तो दाग भी ये
दुनिया फिर भी खुश रहती है;
सूरज ने तो जल-तपकर भी
चाँद को प्रकाश दिया,
चाँद न जाने किस कारण
उस सूरज का उपहास किया;
समस्या तो ये बहुत बड़ी है
सूर्यग्रहण कोई विकट घड़ी है।
चंद्रमा मौका पाता है
शक्ति का जोर दिखाता है,
पल भर में ही कोशिश कर
सूर्य के उपर छा जाता है;
अब सूर्य बेचारा क्या करेगा
किससे अपनी बात कहेगा,
वो चाँद कोई इस नभ का है
रात का राजा कहलाता है,
तारों के बीच संवर करके
दुनिया का मन बहलाता है;
सूर्य के बेदाग़ तेज से
दुनिया सदा जली रहती है,
चाँद पर तो दाग भी ये
दुनिया फिर भी खुश रहती है;
सूरज ने तो जल-तपकर भी
चाँद को प्रकाश दिया,
चाँद न जाने किस कारण
उस सूरज का उपहास किया;
समस्या तो ये बहुत बड़ी है
सूर्यग्रहण कोई विकट घड़ी है।
Friday, August 11, 2006
लहरों में उतरता हूँ
शांत तरंगें सरिता की
लहरें बनकर आती है,
देख रहा हूँ कश्ती को
जो लहरों से टकराती है;
साहिल पर बैठा-बैठा
देख-देख मन बहलाता हूँ,
लहरें उठती और गिरती है
तट पर ही पछताता हूँ;
साहिल पर बैठे हमने
कश्ती को चलते देखा है,
लहरों से टकराकर उसको
टूट बिखरते देखा है;
सपनो की नौकाएं आती
जीवन रुपी सरिता में,
साहस का पतवार थामकर
नाविक कोई उतरता है;
धाराओं में जाकर वह
भंवरों से टकराता है,
कोई लहरों में रह जाता है
कोई फ़िर से साहिल पाता है;
देख-देख इन लहरों को अब
मन में लहरें भरता हूँ,
कोई कश्ती लेकर फ़िर से
लहरों में आज उतरता हूँ.
लहरें बनकर आती है,
देख रहा हूँ कश्ती को
जो लहरों से टकराती है;
साहिल पर बैठा-बैठा
देख-देख मन बहलाता हूँ,
लहरें उठती और गिरती है
तट पर ही पछताता हूँ;
साहिल पर बैठे हमने
कश्ती को चलते देखा है,
लहरों से टकराकर उसको
टूट बिखरते देखा है;
सपनो की नौकाएं आती
जीवन रुपी सरिता में,
साहस का पतवार थामकर
नाविक कोई उतरता है;
धाराओं में जाकर वह
भंवरों से टकराता है,
कोई लहरों में रह जाता है
कोई फ़िर से साहिल पाता है;
देख-देख इन लहरों को अब
मन में लहरें भरता हूँ,
कोई कश्ती लेकर फ़िर से
लहरों में आज उतरता हूँ.
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