एक बार की है बात
नागजी से हुई नेवला की मुलाकात,
बातचित की हुई शुरुआत;
नेवला ने कहा प्रणाम
नागजी बोले राम-राम,
अरे नेवला
तुम्हारा नाम हमने बहुत सुना है
बोल तो सही तेरा 'credential' क्या है?
नेवला को 'english' भला आया नहीं
'credential' मतलब समझ पाया नहीं,
बोला नागजी
वैसे तो बहुत है
मगर आप अपनी बता देते
तो हम अपनी अनुमान लगा लेते;
नाग कुटिलता से हंसा
की नेवला बेचारा तो फंसा,
देखो पास है नागमणि ये
साथ में नागिन रानी ये,
मेरे कोप से मेढक,चूहे भागते हैं
कुछ तो रात-रात भर जागते हैं,
मेरे गरल-दंश से इंसान परेशान है
मनाता नाग-पंचमी, मानता भगवान् है;
शंकर का मित्र,विष्णु का सवारी
दुनिया कहती मैं हूँ इच्छाधारी;
बोलकर नागजी किए अट्टहास
नेवला रह गया चुपचाप,
वह सोच में पड़ गया
सोचकर अफ़सोस कर गया,
सचमुच उसे तो नागिन लोग भी प्यार करती है
मुझे तो देखते ही फुफकार भरती है,
लोग उसकी पूजा करते हैं
मुझे बच्चे भी छेड़ते हैं,
नागजी तो GOD आदमी है
मुझमें ही कुछ कमी है,
नाग हँसते-हँसते चला गया
नेवला सोचते ही रह गया.....
Wednesday, September 26, 2007
मैं --एक सवेरा
नही मैं सरगम संध्या की
ना ही निशा का साया हूँ ,
मैं एक सवेरा इस युग का
धरती की धुन्धिल काया पर
किरणे मधुर फैलाता हूँ ;
नहीं पिटारी जादू की
ना ही कोई माया हूँ ,
मैं एक सपेरा इस युग का
सर्पों का भी मन बहलाने
चंचल बीन बजाता हूँ ;
नहीं मैं कोई कल्पना कोरी
ना ही किसी का छाया हूँ ,
मैं एक चितेरा इस युग का
पकड़ तुलिका इन हाथों में
रंगों को बिखराता हूँ ;
नहीं फरिस्ता इस दुनिया का
ना ही कुछ कहने आया हूँ ,
मैं एक लुटेरा इस युग का
लूट तुम्हारे भावों को
कविता नया बनाता हूँ ।
ना ही निशा का साया हूँ ,
मैं एक सवेरा इस युग का
धरती की धुन्धिल काया पर
किरणे मधुर फैलाता हूँ ;
नहीं पिटारी जादू की
ना ही कोई माया हूँ ,
मैं एक सपेरा इस युग का
सर्पों का भी मन बहलाने
चंचल बीन बजाता हूँ ;
नहीं मैं कोई कल्पना कोरी
ना ही किसी का छाया हूँ ,
मैं एक चितेरा इस युग का
पकड़ तुलिका इन हाथों में
रंगों को बिखराता हूँ ;
नहीं फरिस्ता इस दुनिया का
ना ही कुछ कहने आया हूँ ,
मैं एक लुटेरा इस युग का
लूट तुम्हारे भावों को
कविता नया बनाता हूँ ।
Saturday, August 18, 2007
याद

उस मौसम की मस्ती में
हौले हौले तुम हंसती थी
उन यादों को भुला गया
तुमको भूल नही पाया ;
सावन की रिम-झिम बूंदों ने
तेरे पायल की छन-छन को
स्मृति-पटल पर फ़िर लाया
तुमको भूल नही पाया ;
बादल से ये नैन तुम्हारे
चंचल मन सुन्दर चितवन
कंचन सी तेरी वो काया
तुमको भूल नही पाया ;
इस दुनिया से दूर कही
सपनो को जहाँ भय नही
स्वप्न मूझे वहीं ले आया
तुमको भूल नही पाया ॥
Sunday, June 24, 2007
वेदना और बहुव्यक्तितव

किसी मन में गहरी वेदना है
अगर तीव्र उसकी संवेदना है,
तो कभी-कभी सोचता हूँ
उसका क्या हाल होता होगा
कैसे वह गम पीता होगा
कैसे जीवन जीता होगा ?
क्या उसके ह्रदय में घुटन
का अहसास नही होता होगा?
क्या उसका मन नही रोता होगा ?
शायद होता ही होगा उसे
अनेक दुखों का अहसास ,
विकल होता होगा ह्रदय
रूकती रहती होगी सांस ;
मगर साँसे रूक सकती नही
उसे जीवन में विश्वास है ,
अगर दुःख उसे अनायास है
तो शायद दवा भी पास है ;
जो समस्यायों से जूझता होगा
उसी के पास समाधान होता होगा,
उस व्यक्ति के अन्दर ही एक
अलग व्यक्तित्व का निर्माण होता होगा,
उस व्यक्ति को अगर ये ज्ञान नही
तो वो बिल्कुल परेशान होता होगा ;
क्यूंकि वो अलग व्यक्तित्व हीदुःखों का समाधान करता होगा ,
जिसका प्रतिकूल सा असर
उस व्यक्ति पर भी पड़ता होगा ;
आज इस निराशा के दौड़ में
सब के सब ही लोग हतास हैं,
यही एक वजह है कि आज
बहुव्यक्तित्व सबके पास है ॥
-Related with Freud theory of psychology-
Friday, May 18, 2007
आत्म-छवि और अंतर्द्वंद

हम जिस पर विचार करते हैं
और नही व्यवहार करते हैं ,
जिसपर सिर्फ़ हम सोचते हैं
जिसका सत्य नही खोजते हैं ,
जो कल्पना के दर्पण में
हमारा मन बहलाता है ,
वह आत्म-छवि कहलाता है ।
आत्म-छवि हमारा ही एक रूप है
हमारे स्वप्न का एक स्वरूप है ,
स्वप्न के बाहर भी एक संसार होता है
संसार भी हर छवि का एक बीज बोता है,
वह बीज भी वृक्ष बन जाता है
जो सामाजिक छवि कहलाता है
सामाजिक छवि का अपना ही मान है
जिसका हर किसी को सदा ध्यान है ।
कभी आत्म छवि तो उससे मेल खा जाते है
कभी आईने में उलटी तस्वीर नज़र आते है ,
और तब दोनो छवि आपस में टकराते है
समाज के साथ हम भी परेशान हो जाते हैं ,
इस टकराव का कभी परिणाम आता है
कभी यही एक 'अंतर्द्वंद' बन जाता है ।
ये अंतर्द्वंद एक स्थिति है
जिसमें विजय की आस नही ,
करते हम प्रयास नही
रहता मन में विश्वास नही ,
हार कर भी जीत का आभास होता है
कभी जीत कर भी मन बहुत रोता है ,
समाज से कह दो मेरी छवि छीन लें
अब मैं आत्म-छवि अपना रहा हूँ ,
अब अंतर्द्वंद करने की ताक़त नही
मैं तुमसे द्वंद करने आ रहा हूँ॥
-A conflict between Ego and Superego- related to Freud theory of psychology-
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