Wednesday, October 03, 2007

नागमणि

हाय  रे  विधाता 
ये तुमने क्या किया
इतनी बहुमूल्य मणि
किसके सिर पर दे दिया
एक तो वह नाग है
दुष्टता की आग है ...
हर फन में उसके
जहर ही जहर है ,
क्रोध में उसके
कहर ही कहर है ;
उसके सिर पर नागमणि
हे विधाता
तु कैसा महादानी ?

सुनकर विधाता घबराये
फिर हौले से मुस्कुराये
वह कोई मणि नही
चमकता पत्थर मात्र है ,
वो तुच्छ नाग ही
जिस तुच्छता का पात्र है ,
वह बहुमूल्य इसलिये है
की उस दुष्ट के पास है ,
दुर्लभ जिसकी आस है ;

मैंने
फिर नागमणि की ओर देखा

देखकर ललचाया
फिर सोच मन बहलाया
ये तो बहुमूल्य नाहीं है
शायद !! विधाता ही सही है ...

Wednesday, September 26, 2007

नाग और नेवला

एक बार की है बात
नागजी से हुई नेवला की मुलाकात,
बातचित की हुई शुरुआत;
नेवला ने कहा प्रणाम
नागजी बोले राम-राम,
अरे नेवला
तुम्हारा नाम हमने बहुत सुना है
बोल तो सही तेरा 'credential' क्या है?

नेवला को 'english' भला आया नहीं
'credential' मतलब समझ पाया नहीं,
बोला नागजी
वैसे तो बहुत है
मगर आप अपनी बता देते
तो हम अपनी अनुमान लगा लेते;

नाग कुटिलता से हंसा
की नेवला बेचारा तो फंसा,
देखो पास है नागमणि ये
साथ में नागिन रानी ये,
मेरे कोप से मेढक,चूहे भागते हैं
कुछ तो रात-रात भर जागते हैं,
मेरे गरल-दंश से इंसान परेशान है
मनाता नाग-पंचमी, मानता भगवान् है;
शंकर का मित्र,विष्णु का सवारी
दुनिया कहती मैं हूँ इच्छाधारी;
बोलकर नागजी किए अट्टहास
नेवला रह गया चुपचाप,

वह सोच में पड़ गया
सोचकर अफ़सोस कर गया,
सचमुच उसे तो नागिन लोग भी प्यार करती है
मुझे तो देखते ही फुफकार भरती है,
लोग उसकी पूजा करते हैं
मुझे बच्चे भी छेड़ते हैं,
नागजी तो GOD आदमी है
मुझमें ही कुछ कमी है,
नाग हँसते-हँसते चला गया
नेवला सोचते ही रह गया.....

मैं --एक सवेरा

नही मैं सरगम संध्या की
ना ही निशा
का साया हूँ ,
मैं एक सवेरा इस युग का
धरती की धुन्धिल काया पर
किरणे मधुर फैलाता हूँ ;

नहीं पिटारी जादू की
ना ही कोई माया हूँ ,
मैं एक सपेरा इस युग का
सर्पों का भी मन बहलाने
चंचल बीन बजाता हूँ ;

नहीं मैं कोई कल्पना कोरी
ना ही किसी का छाया हूँ ,
मैं एक चितेरा इस युग का
पकड़ तुलिका इन हाथों में
रंगों को बिखराता हूँ ;

नहीं फरिस्ता इस दुनिया का
ना ही कुछ कहने आया हूँ ,
मैं एक लुटेरा इस युग का
लूट तुम्हारे भावों को
कविता नया बनाता हूँ


Saturday, August 18, 2007

याद
















उस मौसम की मस्ती में
हौले हौले तुम हंसती थी
उन यादों को भुला गया
तुमको भूल नही पाया ;

सावन की रिम-झिम
बूंदों ने
तेरे पायल की छन-छन को
स्मृति
-पटल पर फ़िर लाया
तुमको भूल नही पाया ;

बादल से ये नैन तुम्हारे
चंचल मन सुन्दर
चितवन
कंचन सी
तेरी वो काया
तुमको भूल नही पाया ;

इस दुनिया से दूर कही
सपनो को जहाँ भय नही
स्वप्न मूझे वहीं ले आया
तुमको भूल नही पाया ॥

Sunday, June 24, 2007

वेदना और बहुव्यक्तितव












किसी मन में गहरी वेदना है
अगर तीव्र उसकी संवेदना है,
तो कभी-कभी सोचता हूँ
उसका क्या हाल होता होगा
कैसे वह गम पीता होगा
कैसे जीवन जीता होगा ?

क्या उसके ह्रदय में घुटन
का अहसास नही होता होगा?
क्या उसका मन नही रोता होगा ?

शायद होता ही होगा उसे
अनेक दुखों का अहसास ,
विकल होता होगा ह्रदय
रूकती रहती होगी सांस ;

मगर साँसे रूक सकती नही
उसे जीवन में विश्वास है ,
अगर दुःख उसे अनायास है
तो शायद दवा भी पास है ;

जो समस्यायों से जूझता होगा
उसी के पास समाधान होता होगा,
उस व्यक्ति के अन्दर ही एक
अलग व्यक्तित्व का निर्माण होता होगा,
उस व्यक्ति को अगर ये ज्ञान नही
तो वो बिल्कुल परेशान होता होगा ;

क्यूंकि वो अलग व्यक्तित्व ही
दुःखों का समाधान करता होगा ,
जिसका प्रतिकूल सा असर
उस व्यक्ति पर भी पड़ता होगा ;

आज इस निराशा के दौड़ में
सब के सब ही लोग हतास हैं,
यही एक वजह है कि आज
बहुव्यक्तित्व सबके पास है ॥


-Related with Freud theory of psychology-