मैं इसे महसूस करता था
और तुम इसे जी रहे हो !
कभी शब्दों में
कभी गीतों में
कभी भावों में
कभी अर्थों में
कभी वेदना
कभी संवेदना
कभी कल्पना ,
मैं इसे महसूस करता था
और तुम इसे जी रहे हो !
इस घुटन को
इस बंधन को
इस संघर्ष को
इस जीवन को
इक इच्छा
इक हौसला
इक परिणाम,
मैं इसे महसूस करता था
और तुम इसे जी रहे हो !
Thursday, January 29, 2009
Wednesday, November 26, 2008
आशा और विश्वास
जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम विश्वास बहुत है।
अपने अन्दर युगों-युगों से
सागर प्यास जगाया था,
जल की कुछ बूंदों को वह
दरिया से आस लगाया था;
दरिया जब पानी लाया तो
प्यासा सागर सोच रहा है,
अब पीने की चाह नहीं है
पानी मेरे पास बहुत है ।
जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम विश्वास बहुत है।
जब उषा काल में देरी थी
वो रात बड़ी अँधेरी थी,
उस अन्धकार के कम्बल में
आसमान तब सिमट गया था;
नभ में आयी चांदनी तो
आसमान ये सोच रहा है,
अब चंदा की चाह नहीं है
तारे मेरे पास बहुत हैं ।
जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम विश्वास बहुत है।
नील गगन की सीमा पाने
दूर क्षितिज से गले मिलाने,
या फिर किसी शिखर को पाने
क्या उसकी मंजिल वही जाने ;
वो आसमान में थका पखेरू
शिखर देख अब सोच रहा है,
अब उड़ने की चाह नहीं है
मंजिल मेरे पास बहुत है ।
जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम विश्वास बहुत है।
Monday, November 24, 2008
क्या आज लिखूं ?
कविता मैं क्या आज लिखूं
कि तेरे मन में उठे हिलोर ?
तस्वीर तुम्हारी है मन में
शब्दों में उसे सजाने दो,
उन शब्दों से गीत बनाकर
झूम के मुझको गाने दो ;
इन गीतों में वो प्रीत छुपी है
जो कर दे तुमको भाव-विहोर,
कविता मैं क्या आज लिखूं
कि तेरे मन में उठे हिलोर ?
मंडराए नभ में ये बादल
वन में नाचे कोई मोर,
इन्द्रधनुष के सात रंग में
छाए धरती चारों ओर ;
सावन के मतवाले बादल
गरज-गरज बरसे घनघोर,
कविता मैं क्या आज लिखूं
कि तेरे मन में उठे हिलोर ?
कि तेरे मन में उठे हिलोर ?
तस्वीर तुम्हारी है मन में
शब्दों में उसे सजाने दो,
उन शब्दों से गीत बनाकर
झूम के मुझको गाने दो ;
इन गीतों में वो प्रीत छुपी है
जो कर दे तुमको भाव-विहोर,
कविता मैं क्या आज लिखूं
कि तेरे मन में उठे हिलोर ?
मंडराए नभ में ये बादल
वन में नाचे कोई मोर,
इन्द्रधनुष के सात रंग में
छाए धरती चारों ओर ;
सावन के मतवाले बादल
गरज-गरज बरसे घनघोर,
कविता मैं क्या आज लिखूं
कि तेरे मन में उठे हिलोर ?
Sunday, October 19, 2008
विकलता
आज मेरा मन विकल है,
तोड़कर इन बंधनों को
काटकर इन बेडियों को
उड़ने को इस आसमान में
होता प्रतिपल चंचल है ,
आज मेरा मन विकल है ;
भूल के सारी यादों को
और पुराने वादों को
बसने को किसी पर्णकुटी में
बहता निर्झर जहाँ कल-कल है
आज मेरा मन विकल है ।
तोड़कर इन बंधनों को
काटकर इन बेडियों को
उड़ने को इस आसमान में
होता प्रतिपल चंचल है ,
आज मेरा मन विकल है ;
भूल के सारी यादों को
और पुराने वादों को
बसने को किसी पर्णकुटी में
बहता निर्झर जहाँ कल-कल है
आज मेरा मन विकल है ।
Tuesday, September 30, 2008
मन का ज्वार
स्मृतियों के झोंकों से
विकल आज है मेरा मन,
संभालो मेरे कश्ती को
पतवार टुट रहा है,
मन में ज्वार उठ रहा है।
यादों की घनघोर घटा से
संकट में मेरा जीवन,
बचा खेवैया मेरी नैया
मझधार डुब रहा है,
मन में ज्वार उठ रहा है।
विकल आज है मेरा मन,
संभालो मेरे कश्ती को
पतवार टुट रहा है,
मन में ज्वार उठ रहा है।
यादों की घनघोर घटा से
संकट में मेरा जीवन,
बचा खेवैया मेरी नैया
मझधार डुब रहा है,
मन में ज्वार उठ रहा है।
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