Monday, August 31, 2009

अतीत में झांकता हूँ


प्रभात
की डेहरी पर बैठा
रात्रि की ओर ताकता हूँ

एक लगाव जो मुझे हुआ था
उस अजब-अनोखी रात से,
जिस रात का कितना पहर था
मुझे आज भी मालूम नहीं है ;

आज भी मुझे याद नही
वह रात थी कितनी अँधेरी,
कितना विषम
कितना त्रासद
कोई पाप था या शाप था
पर मन मेरा है काँपता
सोचकर उस रात को
जिसमें छुपा मेरा दर्द है
और सिमटा शब्द है

प्रभात की डेहरी पर बैठा
रात्रि की ओर ताकता हूँ

ताकत नहीं मुझमें बचा
चलूँ दिवस की ओर जरा,
चाहत नहीं मुझमें बचा
लूटूं किरणों का भी मजा ;

चाह मेरी लुट गई
उम्मीद मगर शेष है
कि दिवा की किरणें कभी
मुझको ललचाएगी
मुझको बहकाएगी
कभी हौसला बढाएगी
नए पाठ पढ़ाएगी
पर फिलहाल इससे बेखबर
अतीत में झांकता हूँ ,
प्रभात की डेहरी पर बैठा
रात्रि की ओर ताकता हूँ ।।

Friday, April 10, 2009

प्रेरणा खो दिया हूँ

प्रेरणा बनके मैं दुनिया की
प्रेरणा अपनी मैं खो दिया हूँ।

राहों में सबके ये दीपक जलाए
मन का अँधेरा मिटा नहीं पाया,
और उन अंधेरों में राहों को ढूंढता
ठोकर हमेशा मैं खाके जिया हूँ ;
प्रेरणा बनके मैं दुनिया की
प्रेरणा अपनी मैं खो दिया हूँ।


सागर में मथनी चलाने वालों
अब मेरे पास वापस न आना,
सागर से अमृत निकले, न निकले
विष जो भी निकला मैं ही पिया हूँ;
प्रेरणा बनके मैं दुनिया की
प्रेरणा अपनी मैं खो दिया हूँ

Friday, April 03, 2009

कोई मुझे आवाज़ न दो

आज पुरानी राहों से
कोई मुझे आवाज़ न दो;

उन आंखों में कोई सपना था
उन सपनों में था नाम तेरा,
तेरे नाम का मैं दीवाना था
तू शमां थी मैं परवाना था ;
अब तन्हा मुझको रहने दो
तन्हाई ये आबाद न हो ,
आज पुरानी राहों से
कोई मुझे आवाज़ न दो ।

Tuesday, February 24, 2009

सच या सपना





सच में रहूँ या सपनों में
ये बात समझ नही पाता हूँ ;

सच भी मुझे बुलाता है
सपने भी मुझे बुलाते हैं,
सच भी मुझे रुलाता है
सपने भी मुझे रुलाते हैं;
सपनों में उलझ सा जाता हूँ
सच से भी धोखा खाता हूँ,
सच में रहूँ या सपनों में
ये बात समझ नही पाता हूँ ।

ये सपने तो क्षणभंगुर हैं
सच यही मुझे सुनाता है,
ये सच पर नीरस सा है
सपना यही मुझे दिखाता है;
सच की सुनूँ या सपने देखूं
इस द्वंद में मैं रह जाता हूँ,
सच में रहूँ या सपनों में
ये बात समझ नही पाता हूँ ।

Saturday, February 14, 2009

सितारों का जीवन ....THE STAR LIFE

सितारों में क्या देखते हो ?
या देखकर क्या सोचते हो ?
क्या तुमने अपने चिंतन में कभी उसे महसूस किया है ?

गौर से उसकी ओर देखो....
कभी आसपास के सितारों को
देख रहा है,
कभी धरा पर नज़र फ़ेंक रहा है
कि लोग उसे क्यों देख रहे हैं ?

कभी सूय ताप लेकर आ चमकता है,
कभी चाँद दर्प लेकर आ धमकता है ,
कभी बादल, कभी बिजली, कभी बारिश,
पता नहीं....वह कब संभलता है !

आज वह गर्दिश में है
पूर्ण चाँद के दबिश में है,
(अब उसको कैसे देखें
आओ उसे महसूस करें...)

इन सितारों का जीवन
कई पहेलियों से भरा है,
हर एक सितारा यहाँ
कई सितारों से घिरा है ।

कहीं कोई तारा घुट रहा है
कहीं कोई तारा टूट रहा है ।।

- आलोक-