आज कुछ लिखना चाहता हूँ
पर क्या लिखूं
किसकी सुनूँ
दिल की या दिमाग की
धोका तो हर कोई देता है
दिल भी धोखेबाज़ होता है.
कभी तुम दिल की सुने हो
क्या सपने मन में बुने हो?
अब सपना क्या है
क्या कोई जल का श्रोत
या फ़िर....(ह्म्म्म्म नींद आ रही है मुझे )
नहीं आज कुछ लिख ता हूँ ....
हाँ तो सपना क्या है
क्या कोई शीशमहल
जो पल में चकनाचूर हो जाता है,
या वो बालू के घरौंदे
जिसे हिलोरें जब चाहे दूर ले जाता है.
ह्म्म्म...कोर्रेक्ट...अब...अब.. उन्न्न्न्न्न्न्न..
हाँ बालू के घरौंदे टूट जाते हैं
रेतों की दीवार बिखर जाता है,
पर एक विश्वास निखर जाता है,
क्या.....
कि दिल कोई समंदर की रेत नहीं होता
इसपर लिखा कुछ अपना निशां नहीं खोता,
जितनी कोशिश करो तुम इसे मिटाने की
जख्म उतना ही दर्द पैदा करता है,
दिल फिर भी जिन्दा रहता है, नहीं मरता है।
Wednesday, October 04, 2006
Friday, September 15, 2006
भूचाल
-और खेल खत्म होता है
खत्म होता है कोई जुनून,
मिलती है तो सिर्फ़ बर्बादी
पर बरबाद कौन होता है
कौन हँसता, कौन रोता है;
इस खेल में किसे क्या मिला
किसको शिकवा है किसे गिला,
सागर में तो भूचालों का
चलता रहता है कोई सिलसिला;
सागर शांत हो जाता है
लहरें थम सी जाती है,
पर सोचो उस बस्ती का भी
सदा-सदा जो मिट जाती है;
लहरों का सम्मान यही है
ये बस्ती कहीं मिटाता है,
सागर का अपमान यही है
कोई कश्ती नही डुबाता है;
पर अपमानों को सहकर भी
सागर क्या कर पाता है,
फिर लहरें कोई बलखाती है
भूचाल नया आ जाता है।
खत्म होता है कोई जुनून,
मिलती है तो सिर्फ़ बर्बादी
पर बरबाद कौन होता है
कौन हँसता, कौन रोता है;
इस खेल में किसे क्या मिला
किसको शिकवा है किसे गिला,
सागर में तो भूचालों का
चलता रहता है कोई सिलसिला;
सागर शांत हो जाता है
लहरें थम सी जाती है,
पर सोचो उस बस्ती का भी
सदा-सदा जो मिट जाती है;
लहरों का सम्मान यही है
ये बस्ती कहीं मिटाता है,
सागर का अपमान यही है
कोई कश्ती नही डुबाता है;
पर अपमानों को सहकर भी
सागर क्या कर पाता है,
फिर लहरें कोई बलखाती है
भूचाल नया आ जाता है।
Monday, September 11, 2006
एक नज़र
ek nazar pichhle mahine par...
***malhar elims clear
final haaar gaya :((
*freshi cult orientation (hindi in speaker club roxxx)
****debating secy of h8(really a big battle...i felt the heat)
*sop box--most entrtning award...
**ek aur nazzariya (the best sophie prod...)
*meta freshi orientation (no comment...kavita roxxx)
**open elocution...5th prize (maayne to rakhta hai)
**MI competition (all hindi work ...see the site www.moodi.org )
***my article in aawaaz(me only from sophie batch..)
*only poem is there is mine...
*organizing GD sessions n working in hostel activity.
hmmmm aur kuchh baaki rah gaya kya...
***malhar elims clear
final haaar gaya :((
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*sop box--most entrtning award...
**ek aur nazzariya (the best sophie prod...)
*meta freshi orientation (no comment...kavita roxxx)
**open elocution...5th prize (maayne to rakhta hai)
**MI competition (all hindi work ...see the site www.moodi.org )
***my article in aawaaz(me only from sophie batch..)
*only poem is there is mine...
*organizing GD sessions n working in hostel activity.
hmmmm aur kuchh baaki rah gaya kya...
Tuesday, September 05, 2006
एक नज़रिया
पिंजरे के अंदर का पंछी
देख के दुनिया ललचाता है,
दुनिया उनको भा जाता है;
हम जाकर ये समझाते
दुनिया बाहर बहुत बुरी है,
पंछी नही समझ पाता है;
फ़िर जाकर ये समझाते
देखो पिंजरे की सुंदरता,
पंछी नही समझ पाता है;
कोशिश लाखें करो मगर
उनका नज़रिया नही बदलता,
नही बदलता, नही बदलता।
ek aur nazzariya...a sophie production.
देख के दुनिया ललचाता है,
दुनिया उनको भा जाता है;
हम जाकर ये समझाते
दुनिया बाहर बहुत बुरी है,
पंछी नही समझ पाता है;
फ़िर जाकर ये समझाते
देखो पिंजरे की सुंदरता,
पंछी नही समझ पाता है;
कोशिश लाखें करो मगर
उनका नज़रिया नही बदलता,
नही बदलता, नही बदलता।
ek aur nazzariya...a sophie production.
Thursday, August 31, 2006
एक और नज़रिया
शरद पूर्णिमा की रात ये
चाँद अपने यौवन पर है,
ओस गिरे हैं,सुमन खिले हैं
जगमग-जगमग डगर-डगर है,
सरिता की ये शांत लहर है,
साहिल पर बैठा कोई चकोर
चाँद देख मन बहलाता है,
चाँद भी ख़ुद पर इतराता है....
अमावस्या की रात ये
अपने गगन में चाँद कहाँ है
ओस कहाँ हैं,सुमन कहाँ है,
अन्धकार हर डगर-डगर है
सरिता में भी कहाँ लहर है,
साहिल पर बैठा वही चकोर
आंसू लाख ये बरसाता है,
चाँद भी ख़ुद पर शर्माता है ....
दिन बदले, बदला नही मौसम
और नज़रिया बदल रहा है
बदल रहा है,बदल रहा है....
...ek aur nazzariya...a sophie production....
चाँद अपने यौवन पर है,
ओस गिरे हैं,सुमन खिले हैं
जगमग-जगमग डगर-डगर है,
सरिता की ये शांत लहर है,
साहिल पर बैठा कोई चकोर
चाँद देख मन बहलाता है,
चाँद भी ख़ुद पर इतराता है....
अमावस्या की रात ये
अपने गगन में चाँद कहाँ है
ओस कहाँ हैं,सुमन कहाँ है,
अन्धकार हर डगर-डगर है
सरिता में भी कहाँ लहर है,
साहिल पर बैठा वही चकोर
आंसू लाख ये बरसाता है,
चाँद भी ख़ुद पर शर्माता है ....
दिन बदले, बदला नही मौसम
और नज़रिया बदल रहा है
बदल रहा है,बदल रहा है....
...ek aur nazzariya...a sophie production....
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