Tuesday, August 29, 2006

शतरंज

शतरंज हम खेल रहे थे
मनो-यातना झेल रहे थे,
मैं सोच रहा टेढा-टेढा
वह सीधा-सीधा खेल दिया;
बाज़ी फिर मैं हार गया ....

चाल-चाल कुछ कहते थे
मोहरे-मोहरे बोल रहे थे,
हर स्थिति और परिस्थिति
भेद उसी का खोल रहे थे;

पर मैंने बिना सोचे-समझे
घोड़ा चला, वजीर बचाया,
खेल जीत जब वापस आया
राजा को नही जगह पे पाया;

शायद मैं था हार चुका
तब जाकर ये पता चला,
मेरे जीत पर क्यूँ हैरानी
तब जाकर ये पता चला;

शतरंज नही दो मानव का
शतरंज विचारों का केवल,
अब विचार तो टूट गया
शतरंज भी छूट गया।

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