Sunday, August 20, 2006

उचित अवसर

अतुल शौर्य से सुशोभित
प्रतापी वीर महादानी,
कुरुक्षेत्र की सनसनी वह
पर दम्भी महा-अभिमानी;

जिस कर्ण के भुजबल से ही
समरभूमि ये डोल रहा है,
आज समर की इस बेला में
सामने निहत्था खड़ा है;

केशव! क्या ये धर्म होगा
निहत्थे पर प्रहार करूंगा,
ले अधर्म का मैं सहारा
शत्रु का संहार करूंगा;

अर्जुन! मिटा दो शत्रु को
उचित अवसर यही है,
ये धर्म और अधर्म क्या
सोचना विल्कुल नही है;

सोच कर तुम क्या करोगे
सोचोगे तब क्या लडोगे,
पार्थ कर्म करते रहो
तभी समर-विजयी बनोगे।

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